क्या कानून केवल जनता पर थोपने के लिए बनाए जाते है या सभी के लिए कानून एक सामान होते है

     संयुक्त अभिभावक संघ प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू और मंत्री मनोज जसवानी ने विज्ञप्ति में कहा कि आज जिस प्रकार निजी स्कूल संचालकों द्वारा खुलेआम कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही है, उससे साफ प्रतीत होता है कि निजी स्कूलों की खिलाफत में कही ना कही सरकारी संरक्षण प्राप्त है। क्योंकि जब-जब अभिभावक सड़कों पर उतरा तो उन्हें धरने, प्रदर्शन सहित सभी कार्यक्रम कानून का हवाला और एफआईआर व मुकदमे दर्ज करनी की धमकियां देकर हटा दिया जाता रहा है।



     जबकि दो-तीन पूर्व कलेक्टर को ज्ञापन देने के दौरान भी निजी स्कूल संचालक कलेक्ट्री में धरना देकर आये तब भी कोई कार्यवाही नही की गई. उसके बाद स्टेच्यू सर्किल पर प्रदर्शन किया. कोई कार्यवाही नही की गई और आज शहीद स्मारक पर धरना दिया जा रहा है तो भी सरकार और प्रशासन कोई कार्यवाही नही कर रही है जबकि 25 अक्टूबर को अभिभावकों ने बड़ी चौपड़ पर सरकार का पुतला दहन करने की कोशिश की गई तो पूरा प्रशासन अभिभावकों को घेरकर खड़ा हो गया और पुतले सहित सभी सामान उठाकर ले गए व जौहरी बाजार से बड़ी चौपड़ तक जाने नही दिया गया।


     संयुक्त अभिभावक संघ राज्य सरकार और प्रशासन से पूछना चाहता है कि आखिरकार क्या यह देश अभिभावकों का देश नही है? क्या जो कानून बनाये जाते है वह केवल आम जनता पर थोपने के लिए बनाए जाते है? अगर कानून एक सामान है तो अभिभावकों को भी सड़कों पर उतरने और अपनी बात रखने की छूट दी जाए. केवल निजी स्कूल संचालकों को ही छूट क्यो ?