सत्य सनातन रक्षा सेना के राष्ट्रीय संयोजक और राष्ट्रीय सनातन वाहिनी के राष्ट्रीय महासचिव (धर्म प्रकोष्ठ) अजीत सिन्हा ने आज सनातनी जीवन के पहलुओं पर विचार प्रकट करते हुए कहा कि - जो व्यक्ति या प्राणी परमात्मा की शरण में रहता है और उन पर अपना सर्वश अर्पण कर देता है और लोभ, मोह, माया, अहंकार सहित सभी अवगुणों को त्याग कर पर ब्रह्म की शरणागत रहता है वही अपने कर्मों के भोग भोगकर जन्म - मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है तथा दैवीय शरण को प्राप्त करता है। मिथ्या स्वरूप जगत के भोगों को त्याग करने वाला ही पर ब्रह्म परमात्मा की शरणागत हो सकता है लेकिन इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि लोग अपने कर्तव्यों का त्याग कर पर ब्रह्म में लीन हो जायें अपितु जिन्हें अपने कर्तव्यों में भी परमात्मा की झलक मिलती है वे ही पर ब्रह्म की शरणागत हो सकते हैं.
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(अजीत सिन्हा) |
जिससे मृत्यु लोक जिसे हमलोग पृथ्वी लोक भी कहते हैं के साथ-साथ सभी लोकों की व्यवस्था चरमरा गई. इस हेतु ब्रह्मा जी के 1000 वर्ष की तपस्या के उपरांत स्वयं पर ब्रह्म सदाशिव पर ब्रह्म चित्रगुप्त के रूप में प्रकट हुये और त्रिदेव ने उन्हें अपनी - अपनी शक्ति संयुक्त रूप से प्रदान की जिससे त्रिदेव की शक्तियां केंद्रित रूप में पर ब्रह्म चित्रगुप्त के पास चली गई. जिससे उनके अंदर सृजन, पालन और संहार तीनों शक्तियां आ गईं लेकिन पर ब्रह्म सदाशिव के पास प्रलय करने की भी शक्ति है और चुकी सदाशिव स्वयं चित्रगुप्त के रूप में प्रकट हुये हैं इसलिये पर ब्रह्म चित्रगुप्त के पास सृजन - पालन - संहार के माध्यम से कर्मों का फल देने की शक्ति के साथ-साथ प्रलय करने की भी शक्ति है जिसके प्रमाण वेद, पुराण, उपनिषद् और अन्य पौराणिक ग्रंथों में उपलब्ध है।
सम्भवतः परमात्मा कौन हैं? इसका जवाब मिल गया होगा। सदाशिव, त्रिदेव और पर ब्रह्म चित्रगुप्त के बीच क्या सम्बंध है ये भी आप सभी जान चुके हैं। अब तीसरा प्रश्न यह है कि क्या किसी ने परमात्मा को देखा है? मेरी समझ से बिल्कुल नहीं क्योंकि जो प्रत्येक प्राणी और जीवों के आत्मा में स्तिथ होकर कर्मों के लाभ - हानि की गणना कर प्राणी, जीवों, देव, सुर, असुर और सभी लोकों के कण - कण में रहता हो उसे साक्षात् देख पाना सम्भव नहीं लेकिन भक्तों और उपासकों को परमात्मा के प्रत्येक क्षण की अनुभूति होती है क्योंकि वे परमात्मा के शरणागत होते हैं और उन्हीं में लीन होकर मोह - माया के बंधनों को त्यागकर जन्म - मरण के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। जय पर ब्रह्म, जय सनातन!