सड़क किनारे मां बनी मज़दूर औरत - थोड़ी देर सुस्ताकर फिर पैदल चल घर पहुंची

     सिर पर सामान की गठरी, गोद में दो साल की बच्ची और उसके पीछे तीन और छोटे बच्चे जिनमें सबसे बड़ा सात साल का है. ये शंकुतला और राकेश का परिवार है जो पैदल ही महाराष्ट्र के नासिक से मध्य प्रदेश के सतना के लिए रवाना हुआ. ऐसे हज़ारों मज़दूर एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे. फ़र्क ये था कि शकुंतला गर्भवती थीं. गर्भ का नौवां महीना शुरू हो चुका था और रास्ता बहुत लंबा था.


(Photo - शकुंतला और राकेश का परिवार)



     जहां ये परिवार काम करता था वहां अन्न का एक दाना नहीं बचा था और चार बच्चों को खाना खिलाने के लाले पड़ चुके थे. दिहाड़ी मज़दूरी का काम करने वाले राकेश को एक दिन के 400 रुपये और शकुंतला को 300 रुपये मिलते थे. शकुंतला बताती हैं, “मुझे लगा था कि 10-15 दिन में बच्चा होगा. इतना नहीं सोचा था कि बच्चा होने वाला है. खाने-पीने का सामान सब ख़त्म हो गया था. बस हम तो किस्मत पर छोड़कर चल दिए कि अब जो होगा भगवान भरोसे है.”


     राकेश बताते हैं, ''हम सुबह चले और रास्ते में हमें लोग बिस्किट, खाने का सामान और पानी दे देते थे और हम चलते रहते थे. हम लोग लगभग 60 किलोमीटर चले होगें और शाम होने लगी थी. मेरी पत्नी ने दर्द की शिकायत की और कहा कि लगता है बच्चा पैदा होने वाला है. लेकिन ना वहां कोई अस्पताल था, ना नर्स और ना कोई दाई.''


     शकुंतला बताती हैं, “इस टोली में मौजूद महिलाएं मुझे सड़क किनारे पेड़ के नीचे ले गईं और जल्दी ही मेरी बच्ची हो गई. बच्ची की नाल महिलाओं ने कैंची से काट दी और उसे साड़ी से साफ़ कर के मुझे दे दिया. हम लोगों ने क़रीब एक घंटा आराम किया और फिर चलना शुरू कर दिया. “मेरे चार बच्चे भूखे मर रहे थे. ग़रीब मेहनत नहीं करेगा तो कैसे कमाएगा? बच्चा घर पर होता या बाहर हमारे लिए तो ये एक ही बात है.“ पति राकेश का कहना था कि वो डर गए थे कि अगर मां को कुछ हो जाता तो चार बच्चों का क्या होता. अब उन्हें इस बात का दिलासा है कि मां-बच्चा दोनों ठीक हैं


     ''शकुंतला गोद में बच्ची को लेकर बहुत बहादुरी के साथ खड़ी हुई थीं. उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी. उन्होंने पूरी जांच करवाई और कोविड टेस्ट भी कराया. बच्चे को जन्म के बाद दिए जाने वाले सभी टीके दिये जा चुके हैं. शकुंतला का हिमोग्लोबिन 9.8 है. उन्हें विटामिन और अन्य सप्लीमेंट्स दिए गए हैं. फ़िलहाल, जच्चा-बच्चा स्वस्थ हैं और उन्हें छुट्टी दे दी गई है. ज़िला कलेक्टर ने भी परिवार को 10 हज़ार रुपये और खाने-पीने का सामान दिया है.