आमेर/'गोनेर' का इतिहास (Amber/Goner History) जयपुर

 From - PARAG SAXENA

     गोनेर घाटगेट जयपुर से 20 km दूर गाँव और जगदीश मंदिर की स्थापना सन् 1095 में 1000 वर्ष पहले आमेर के मीणा राजा शूरसिंह सुसावत ने की थी। आमेर की स्थापना ई. पूर्व अंबा मीणा ने की थी। उनके द्वारा स्थापित आमेर, आमागढ़ किला, अंबा माता, अंबीकेश्वर शिव मंदिर 2000 साल बाद आज भी मौजूद हैं। आमेर 52 मीणा राजाओ की प्रधान राजधानी रही थी। आमेर पर मीणा क्षत्रिय राजाओं ने हजारों वर्षो तक राज किया था।

     कच्छावा राजपुतों ने 11-12 सदी में नरवर, ग्वालियर से आकर धोखे से दिवाली पर निहत्थे मीणाओं को मारकर आमेर पर कब्ज़ा किया था। आमेर के मीणा राजा शुरसिंह सुसावत ने सन् 1095 में गोनेर गांव की स्थापना कर द्वितीय सुरक्षित राजधानी बनाया. किले महल के अलावा किसानों प्रजा हितषी दैव जगदीश, विष्णु भगवान का मंदिर बना कर दिव्य मूर्ति स्थापित करवाई।

     शुरसिंह मीणा ने आमेर पर सन् 1095से सन् 1145तक राज किया था। इनके पुत्र भानोराव मीणा को दिवाली के दिन, सन् 1207 में राजपुतों ने धोखे से मारकर आमेर पर कब्ज़ा कर लिया था। शूरसिंह मीणा ने आमेंर के दक्षिण में 20 किमी दूर घने जंगल में गोनेर गाँव की स्थापना की. यहाँ बस्ती कुँए, तालाब, बावडी़, मंदिरो और परकोटे का निर्माण करवाया, सुरक्षित स्थान मानकर, जगदीश मंदिर में दिव्य मूर्ति स्थापित करवाई। 


     आमेर राजधानी नाम के मुताबिक "गोनेर" का नाम रखा. एक हजार वर्ष पहले यह क्षेत्र घने जंगलो से घिरा हुआ था।जंगल के बीच में यहां एक तालाब था, जहां गाये पानी पीती थी। गोनेर, गौ+नीर अर्थात गायों के पानी पीने का पवित्र स्थान. गोनेर गौ अर्थात गोलौक धाम, गौपुरम् विष्णु, जगदीश का धाम। राज ज्योतिषियों से राय लेकर आमेर के मीणा राजा ने गोनेर का नामकरण किया जो 1000 साल बाद भी प्रचलित है।

     आमेर के मीणा राजा शुरसिंह ने गोनेर के रास्ते में पड़ने वाले 2 और गांवों का नामकरण किया वह है। सिरौली गांव एक पहाड़ जिसका सर+ रोली की तरह है। उसका नाम सरोली रखा और एक पहाड़ जिसकी आकृति 'कटार' "दांतली" की तरह है। उस गांव का नाम दांतली रखा। 

     चांदा मीणा जागाओ के अनुसार सिरोली गांव-श्री पाल 'चांदा' मीणा ने, दांतली-दांतसी, मीणा, रोपाडा़-रोपाल मीणा, हरिपाल मीणा ने - हिंगुण्या। बीरो मीणा ने - बुढ़थल, गोपो-गोनेर, जोगो-भटेसरी, आनो-कान्हो ने-आभानेरी, दौषाराय-दौषा, ताडो़ चांदा ने-तुंगा बसाया। गोनेर के पास, श्रीपाल 'चांदा' मीणा ने सिरोली गाँव की पहाड़ी के नीचे बस्ती और महलों का निर्माण करवाया, सिरोली के पहाड़ी के ऊपर, एक अंडरग्राउंड अद्भुत चार मंजिला महल और सुरंग का निर्माण करवाया जो की1000 साल बाद आज भी मौजूद हैं। 

     मीन पुराण के अनुसार आमेर के मीणा राजा सूरसिंह सुसावत और उनकी पत्नी "बाला बाई" रोज ब्रह्म मुहूर्त में गोनेर जगदीश भगवान के दर्शन करने आते थे. उन्होंने आमेर में अंबिकेश्वर शिव और अंबा माता की सेवा पूजा से खुश होकर शिव जी ने आकाश गमन की विद्या प्रदान कर रखी थी। जिसके अनुसार दोनों सशरीर आकाश मार्ग से अपने राज्य के मंदिरों में दर्शन कर वापस आमेंर में चले जाते थे। 

     शिव जी द्वारा यह हिदायत दी थी कि दोनों राजा - रानी एक साथ किसी भी मंदिर में दर्शन ना करने जाए. अगर गलती से भी चले भी गए तो वह नगरी नष्ट हो जायेगी. वे दोनों भी इस बात का विशेष ध्यान रखते थे। दोनों अलग अलग ही दर्शन करने जाते थे। एक बार सन् 1012 में आमेर के मीणा राजा सूरसिंह से गलती हो जाती है। रानी आमेर से गोनेर जगदीश, विष्णु भगवान के दर्शन कर रही थी. पीछे से राजा सूरसिंह मीणा भी दर्शन करने आ जाते हैं. अंधेरे में सूरसिंह अपनी रानी "बालाबाई" को पहचान नहीं पाते हैं और वहां खड़ी रानी को "बाई  साइड में हो जा" कहकर दर्शन करने लगते हैं. रानी बालाबाई घुंघट में थी राजा सूर सिंह पहचान नहीं पाते हैं, रानी आमेर के महल में रूँठ कर सो जाती है।

     आज भी आमेर के महलों में बाला बाई की "साळ" कमरा मौजूद है। तब राजा सूर सिंह रूठने का कारण पूछते हैं तो सारी बात बता देती हैं। अब अपना पति पत्नी का रिश्ता नहीं रहा! सुर सिंह को भी सारी घटना का पता लगी तो गलती का भी एहसास हुआ. शूरसिंह भी वचन के पक्के थे. ईश्वरीय इच्छा समझ कर अपने पुत्र राव भानो-भानोंराव  को आमेर/गोनेर का राज पाट देकर हरिद्वार हिमालय में तपस्या करने चले गए. बीच -बीच में मिलने भी आ जाया करते थे और आखिरी वक्त हरिद्वार में बीता कर, हरि को प्राप्त हो गए. 

     उधर देव योग से गोनेर नगरी भी नष्ट हो गई. मूर्ति और मंदिर भी जमीन में दब गए. 500 साल बाद फिर वो ही मूर्ति सन् 1612 में औरंगजेब के समय किसान "देवा बागडा़" शिवाड़ जयपुर से बैलगाड़ी से कहीं जा रहा था. गोनेर में मंदिर वाले स्थान पर बैलगाड़ी का पहियांँ धंस जाता है। खोदने पर मूर्ति बाहर निकल आती है। अनेक चमत्कार होने लगते हैं। अंधे, लूले, लंगड़े ठीक होने लगते हैं और यह खबर औरंगजेब बादशाह के पास आगरा पहुंचती हैं तो मंदिर तोड़ने के लिए  मुगल सेनापति को भेजा. यहां के जागीरदार ने मुगलों की सेना से डरकर युद्ध किया, उन्हें भगा दिया। दुबारा खुद औरंगजेब आया मंदिर को तोड़ दिया गया। तब जगदीश भगवान ने चमत्कार दिखाया। 

     अकबरनामा के अनुसार और नई के नाथ, मीणा राजा बादाराव "गोमलाडू" के राज में 15वीं शताब्दी में गोनेर गांव  बादाराव मीणा के अधीन आता था। लगान के हिसाब से यह सम्रद्ध नगरी थी। मीणा राजा बादाराव से डरकर जयपुर के राजा भारमल ने सन् 1562 में अकबर से जोधाबाई की शादी करनी पडी़। सन् 1569 में अकबर और भारमल की संयुक्त सेनाओं ने नई नाथ के मीणा राजा के विशाल किले और महलों को नष्ट कर दिया। उनके द्वारा स्थापित शिव मंदिर बचा जो की आज भी लाखों लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है और भारमल ने वहाँ से अतुल खजाना लुटकर जयगढ़ में छुपा दिया. जिसे इंदिरा गांधी दिल्ली ले गई।

     गोनेर पर सन् 1569 में जयपुर के राजा भारमल राजपुतों का अधिकार हो गया था। अकबर नामा के अनुसार 28 मार्च सन् 1681 में औरंगजेब ने सेनापति 'असद खाँ' को गोनेर जगदीश मंदिर को नष्ट करने भेजा. यहां के जागीरदारों को हराकर भगा दिया। इससे औरंगजेब बहुत क्रोधित हुआ।

     14 मई सन् 1681 को स्वयं औरंगजेब विशाल सेना लेकर गोनेर जगदीश मंदिर तोड़ने आया। मंदिर तोड़ दिया गया। किवदंतियों के अनुसार जगदीश भगवान ने औरंगजेब को मुगल सेना सहित अंधा कर दिया. मुल्ला मौलवियों से सलाह लेकर माफी मांगी गई. माफी मांगने पर मंदिर की जगह मक्का मदिना के दर्शन हुए. मंदिर की सीढियों के पास पीरो की मजार बनाकर, इसके नाम 750 बीघा जमीन का पट्टा देकर चला गया। मंदिर का पुनःनिर्माण किया गया। 

     गोनेर के युद्ध के समय जयपुर के राजा रामसिंह थे। रामसिंह की तरफ से जागीरदार सुजान सिंह और गज सिंह ने युद्ध लडा़ और वीर गति पाई थी। इनका साथ "नायला" और सांभरियाँ गाँव के राजपुतों और आस-पास के गाँवों के मीणाओं ने भी खूब साथ दिया। युद्ध में लड़ते हुए सुजान सिंह का सिर गोनेर मंदिर से 1 km दक्षिण में कट कर गिर गया था और धड़ मुगलों से लड़ता, काटता, मुगल सेना को पिछे धकेलता हुआ गोनेर के बाहर उत्तर दिशा में तालाब की पाल पर, 1 किमी उत्तर दिशा में जाकर शाँत हुआ। उनकी एक विशाल छतरी बनी हुई है। जो भौमिया जी के नाम से प्रसिद्ध और पूजे जाते हैं।

     प्राचीन काल में भैरू और भौमियांँ सिर्फ मीणा और राजपुतों में  ही बनते थे। भूमि, प्रजा, मंदिरों की रक्षा में सिर कटने के बाद भी लड़ते रहते थे। बाद में तृतीय बार मंदिर का निर्माण सवाई जयसिंह ने सन् 1710 में करवाया। सारे तथ्यों से स्पष्ट है कि  गोनेर गाँव का नामकरण 1000 साल पहले आमेर के मीणा राजाओ ने द्वितीय राजधानी के रूप में सुरक्षित और ईश्वर साधना के लिए किया था। गोनेर गांव की स्थापना के 18 साल बाद सन् 1112 में जगदीश मंदिर, बस्ती किसी प्राकृतिक आपदा में नष्ट हो गई थी।

      गोनेर गांव कई बार उजड़ा और वापस बसाया गया. इसके 500 साल बाद सन् 1612 में मूर्ति वापस बाहर निकाली गई। जो आज भी भव्य, दिव्य मंदिर में मौजूद है। आज भी देवादास के वंशजों द्वारा सेवा पूजा की जा रही हैं। गोनेर, जयपुर में, लाखों लोगों की जन आस्था का केंद्र बना हुआ है। 

जय जगदीश हरे।।

जय गोनेर।। 

जय जगदीश हरे।।

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