पुतिन ने अपनी नई जीत से दुनिया को दिया ये संदेश

     पुतिन ने रूस को हमेशा के लिए बदल दिया है. उनके समर्थक तो ये पहले ही मानते ही थे लेकिन अब जो उन्होंने बदला, वो ऐतिहासिक है. पिछले महिने रूस के लोगों को फ़ोन पर मैसेज मिला कि उन्हें लाखों के इनाम जीतने के लिए रजिस्टर किया गया है. लेकिन क्यों? दरअसल, रूस में संविधान संशोधन के लिए एक जनमत संग्रह करवाया गया. ज़्यादातर लोगों ने संशोधन के पक्ष में वोट किया. ज़्यादा से ज़्यादा लोग वोटिंग करें, इसके लिए इनाम भी रखे गए.



     इस संविधान संशोधन का आइडिया था राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का. रूस की संसद तो संशोधन पास कर ही चुकी है लेकिन पुतिन ने इस आइडिया पर जनता की मुहर भी लगवाई और अब पुतिन के 2036 तक सत्ता में रहने का रास्ता तो साफ़ हो गया. ये संभव है कि वे जोसेफ़ स्टालिन से भी ज़्यादा लंबे वक्त तक सत्ता में रहने वाले नेता बन जाएंगे.


     वैसे सात दिनों तक चली इस वोटिंग की कोई स्वतंत्र जांच नहीं हुई है. विपक्ष वोटिंग में अनियमितताओं की बात कह रहा है. संविधान संशोधन को लेकर पुतिन तो कहते हैं कि उन्होंने ये लोकतंत्र और बेहतर सरकार के लिए किया लेकिन रूस में कई जानकार मानते हैं कि ये उनकी बदलाव योजना है. मतलब 20 साल सत्ता में रहने के बाद उनके कुछ निजी हित हैं, दोस्त हैं, एक सिस्टम है उनका. वो एकदम गायब तो नहीं हो सकते.


संविधान संशोधन से पुतिन को क्या मिलेगा - सबसे बड़ा सवाल तो यही था कि 2024 में जब उनका राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म हो जाएगा तो फिर क्या होगा. तो इस संविधान संशोधन से क्या ख़ास होगा?



  • पहली बात तो ये कि अब राष्ट्रपति की शक्तियां थोड़ी कम होंगी और पुतिन की तरह और पुतिन जितना लंबा सत्ता में कोई और नहीं रह पाएगा. अब तक किसी भी और देश के मुक़ाबले रूस का राष्ट्रपति पद ज़्यादा ताक़तवर है. रूस का राष्ट्रपति ड्यूमा यानी रूस की संसद को बर्ख़ास्त भी कर सकता है.

  • दूसरी बात, इस संशोधन से संसद की शक्तियां थोड़ी बढ़ेंगी. अभी तक राष्ट्रपति ही प्रधानमंत्री को नियुक्त करता था और ड्यूमा उस फ़ैसले को मंज़ूर करती थी. अब संसद प्रधानमंत्री को नियुक्त कर पाएगी और फिर प्रधानमंत्री अपनी कैबिनेट बनाएगा. पुतिन ने खुद कहा था कि इसका मतलब है कि राष्ट्रपति इन उम्मीदवारों को रिजेक्ट नहीं कर पाएगा. उसे संसद की बात माननी ही पड़ेगी.

  • तीसरी महत्वपूर्ण बात है- स्टेट काउंसिल की शक्तियों का बढ़ना और इसे सरकारी एजेंसी के तौर पर मान्यता देना. अभी तक स्टेट काउंसिल एक सलाहकार परिषद की तरह काम करती थी. माना जा रहा है कि ये स्टेट काउंसिल एक जज की तरह काम कर सकता है. मतलब जब भी कोई विवाद होगा, स्टेट काउंसिल का फैसला ही आख़िरी होगा. इस तरह की अफवाहें हैं कि पुतिन नए स्टेट काउंसिल के प्रमुख हो सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो उनका फ़ैसला ही आखिरी फैसला माना जाएगा. यानी एक तरह से सब उनके कंट्रोल में.