भारत और भारतीयता के विचार और उसकी अस्मिता हिंदू धर्म में ही समाहित है

 From - Anil Kumar Regar

     ये सत्ता के लिए कुछ भी करेंगें। क्योंकि इन्हें इसकी आदत पड़ी हुई है। इनके पूर्वजों का इतिहास उठाकर देखें, कोई शिक्षक, कोई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी का पुत्र, कोई शिक्षिका राजनीति में आकर कैसे करोड़ों-अरबों की सम्पत्ति एकत्र कर लेती है। उनके वारिस आपको जन कल्याण की बात समझाते हैं। यदि आप विवेकशील है, (जाति, लाभ-लोभ, स्वार्थ) भ्रमित नहीं हैं तो आप इनका समर्थन नहीं कर सकते।

     अधिकांश राजनीतिक दल अब वंशवादी, जातिवादी कारपोरेट घरानों का रूप धारण कर चुके हैं और निजी क्षेत्र के उद्योग बन गए हैं। इनकी आत्मा में राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक चेतना का अभाव होता है। ये सिर्फ परिवार और सत्ता की राजनीति करते हैं।

"2 गज की दूरी के साथ मास्क है जरुरी"

     आज अगर भाजपा हिंदुओं की अस्मिता और गौरव के लिए कार्य कर रही है तो इसका कारण उसका अपना राजनीतिक डीएनए है। ये पूरे भारत का डीएनए 40 हजार साल से एक होने का दावा करते हैं। भाजपा पर जब-तब यह आरोप लगता रहता है कि चुनाव के समय ही उसे हिंदू अस्मिता की बात याद आती है लेकिन सच तो यह है कि वह सदैव हिंदू समाज के गौरव की बात करती रही है। विश्वनाथ धाम परियोजना की शुरुआत कोई उत्तर प्रदेश के चुनावों को ध्यान में रखकर नहीं की गई। यह तो प्रधानमंत्री मोदी के संकल्प का हिस्सा थी।

     मुस्लिम कार्ड खेलने वाले दल भाजपा की रीति-नीति से किस तरह बेचैन हैं. इसका प्रमाण उनकी ओर से खुद को हिंदू साबित करने की कोशिशों से मिलता है। कभी वो जनेऊ धारण करते हैं और कभी वो खुद को कश्मीरी ब्राह्मण कहते हैं। इसी तरह कोई चंडी पाठ करती हैं और कोई अपने कार्यकाल में हिंदू तीर्थ स्थलों में कराए गए विकास कार्यो का उल्लेख करता है। इसका मकसद खुद को हिंदू हितैषी साबित करना है। ऐसे नेता यह भूल रहे हैं कि जहां भाजपा का डीएनए ही हिंदूवादी है, वहीं वे सेक्युलरवाद के नाम पर मुस्लिमपरस्ती करते हैं।  

     राहुल गांधी जब यह कहते हैं कि हिंदू अलग हैं और हिंदुत्ववादी अलग. तब खुद को हिंदूवादी साबित करने की उनकी कोशिश नाकाम ही होती है। वो अजीबोगरीब ढंग से यह समझाने की कोशिश कर रहें हैं कि उन्हें हिंदुओं से कोई परहेज नहीं पर वह हिंदुत्ववादियों को गलत मानते हैं। वह क्या कहना चाहते हैं? यह वही बता सकते हैं। हो सकता है कि वो भारतीय समाज को भटका कर एक नया मिथ्य गढ़ने का प्रयास कर रहें हो। जैसा कि भगवा आंतकवाद की अवधारणा को गढ़ने के लिए किया गया था।

     अवसर देश के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पुनरुत्थान का है। इसमें आहूति आपको भी देनी है और याद रखना है: 

बिखरा हुआ समाज और

               बिखरा हुआ परिवार।

कभी भी बादशाह

                    नहीं बन सकता।

लेकिन वह आपस में लड़कर

                     दुसरों को बादशाह अवश्य बना देता है।

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